← All articles
Quran

Takabbur

Article content

इस्लामी तालीमात की रू से बंदे का तकब्बुर व इस्तिक्बार और ज़अम-ए-किब्रिया’ई अल्लाह तआला को हरगिज़ पसन्द नहीं है, अहादीस-ए-मुबारका में फ़रमाया : (1) मुतकब्बिर क़यामत के दिन बशरी शक्ल में चींटियों की मानिंद उठाए जाएंगे, उन पर हर तरफ़ से ज़िल्लत मुसल्लत होगी, उन्हें जहन्नम के एक क़ैदख़ाने में ले जाया जाएगा, जिसका नाम “बूस” है, ऐसी आग के शोले उन पर बुलन्द होंगे, जिसे आगों की आग कहा जाता है ( यानी जो आग को भी जला दे), प्यास बुझाने के लिए उन्हें जहन्नमियों के ज़ख़्मों की पीप पिलाई जाएगी (तिरमिज़ी: 2492)।

(2) अल्लाह तआला फ़रमाता है: किब्रिया’ई और अज़मत मेरी शान है, जो इनमें से किसी एक के बारे में मुझसे झगड़ेगा, मैं उसे जहन्नम में डाल दूँगा (इब्न माजह: 4174)।

इन सिफ़ात में झगड़ने से मुराद यह है कि वह मुतकब्बिर बन जाए, अपने आप को अज़ीमुल मर्तबत समझने लगे और दूसरों को अपने मुक़ाबिल हक़ीर जाने। क़ुरआन-ए-करीम में अल-हश्र की आयात 24-23 में अल्लाह तआला की यह सिफ़ात-ए-जलीला बयान की गई हैं:

“अल-मलिकु” (मुल्क व इक्तिदार का हक़ीकी मालिक), “अल-कुद्दूस” (हर ऐब और नुक़्स से पाक), “अस-सलाम” (सलामती देने वाला), “अल-मुअमिन” (अमान बख़्शने वाला), “अल-मुहैयमिन” (निगहबान), “अल-अज़ीज़” (बहुत ग़ालिब), “अल-जब्बार” (निहायत अज़मत वाला), “अल-मुतकब्बिर” (किब्रिया’ई वाला), “अल-मुनज़िह” (हर नुक़्स और ऐब से पाक), “अल-ख़ालिक़” (ख़ालिक़), “अल-बारि” (मौजिद), “अल-मुसव्विर” (सूरतगिरी फ़रमाने वाला)।

पस इन सिफ़ात में अल्लाह तआला की एक सिफ़त-ए-जलीला “अल-मुतकब्बिर” भी है।

क़ुरआन-ए-करीम में शैतान की सिफ़त-ए-रज़ीला तकब्बुर व इस्तिक्बार बताई गई है, फिरऔन की बाबत भी यही बताया गया: बेशक फिरऔन ज़मीन में बड़ा बन बैठा (अल-क़सस: 4)।

फिरऔन व नमरूद दावा-ए-ख़ुदाई करते रहे लेकिन आख़िरकार अपने-अपने अहद के सब मुतकब्बिरीन निहायत ज़िल्लत आमेज़ और इबरतनाक अंजाम से दो-चार हुए।

क़ारून, जिसके ख़ज़ानों की चाबियों को एक पूरी जमाअत उठाती थी, तमाम तर ख़ज़ानों समेत उसे ज़मीन में धँसा दिया गया।